कुंडली मिलान में नाड़ी-दोष

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 October 5, 2016

जब भी हम किसी वरकन्या के कुंडली मिलान के लिए जाते हैं तो नाड़ी शब्द के बारे में जिक्र अवश्य आता है या बहुत बार बताया जाता है केनाड़ी दोषहोने से कुंडली मिलान ठीक नहीं हो रहा है तो आइये जानते हैं के नाड़ी दोष क्या होता है और कुंडली मिलान में इसका क्या महत्व है

कुंडली मिलान के अंतर्गत किये जाने वालेअष्टकूटमिलान में वर्ण, वश्य, तारा, योनि, ग्रह मैत्री, गण, भृकुट और नाड़ी इन आठ घटकों को मिलाया जाता है जिनमे से प्रत्येक का अपना अलग महत्व है और इन्ही आठ कूटों से मिलकर ३६ गुण बनते हैं जिससे हम सब अवगत हैं परन्तु इन आठ कूटों में भी नाड़ी को बहुत विशेष महत्व दिया गया है इसी लिए 36 में से सर्वाधिक 8 नंबर नाड़ी को दिए गये हैं।

जन्म होने पर जातक की जन्मकुंडली निर्माण में जिस प्रकार उसका जन्म नक्षत्र, राशि, लग्न आदि निशित किये जाते हैं उसी प्रकार जन्मकालीन नक्षत्र स्थिति के अनुसार व्यक्ति की नाड़ी निश्चित होती है जिससे हमारे जीवन के कुछ विशेष घटकों का आंकलन किया जाता है। नाड़ी तीन होती हैं – “आद्या” “मध्या” “अंत्याप्रत्येक नाड़ी हमारे स्वस्थ्य के विषय में कुछ विशेष जानकारी देती है।  किस व्यक्ति की कौनसी नाड़ी होगी यह उसके जन्म नक्षत्र से निश्चित किया जाता है। अब विशेष बात यहां कुंडली मिलान में नाड़ी दोष को लेकर है नाड़ी दोष के बारे में यह बड़ी रोचक बात है के कुंडली मिलाते समय वर कन्या की  बाकि सभी चीजों ( वर्ण, वश्य तार, गण आदि) का समान होना बहुत शुभ माना गया है परन्तु यदि वर और कन्या की नाड़ी सामान हो अर्थात दोनों की एक ही नाड़ी हो तो इसे शुभ नहीं माना जाता और इसे ही नाड़ीदोष  कहते हैं। कुंडली मिलान में वर और कन्या की नाड़ियां अलग अलग होनी चाहिये। सामान नाड़ी होने पर 36 गुणों में नाड़ी के लिए निश्चित 8 अंक में से शून्य अंक मिलते हैं और वर कन्या की नाड़ी अलग होने पर पूरे 8 में से 8 अंक प्राप्त होते हैं जो विवाह और विवाहोपरांत अपनी विशेष भूमिका निभाते हैं।

समान नाड़ी में दोष क्यों

नाड़ी का सम्बन्ध हमारे स्वास्थ, संतान पक्ष और मनोदशा से है परन्तु इनमे भीस्वास्थ पक्षको नाड़ी विशेष प्रभावित करती है। मानव शरीर मेंवात” “पित्तऔरकफप्रकृतियों का एक निशित मात्रा में संतुलन रहता है जिसका प्रतिनिधित्व यही तीन नाड़ियां करती हैं इसके लिए यह श्लोक भी प्रसिद्ध है –

“आदौ वातौ वहती।मध्ये पित्ते तथैव च।

अंतये वहती श्लेष्मा।नाडिका त्रय लक्षणम्”।। (आयुर्वेद)

आद्या नाड़ी वात प्रधान मध्या नाड़ी पित्त प्रधान और अन्त्या नाड़ी कफ प्रधान होती है जिस व्यक्ति की जो नाड़ी होती है उस नाड़ी की प्रकृति के अनुसार  ही उस  व्यक्ति में वात, पित्त या कफ की अधिकता प्राकर्तिक रूप से ही होती है जैसे आद्या नाड़ी वाले व्यक्ति के शरीर में वात की अधिकता होती है मध्या नाड़ी वाले व्यक्ति में पित्त की अधिकता होती है और अन्त्य नाड़ी कफ की अधिकता देती है अब किसी व्यक्ति में जिस तत्व की अधिकता पहले से ही है यदि वह उस तत्व की प्रधानता वाली वस्तुओं का सेवन करे या ऐसी वास्तु या व्यक्तियों के अधिक संसर्ग में रहे तो व्यक्ति में अपनी प्रकृति के अनुसार वात, पित्त या कफ की अधिकता बहुत बढ़ जाएगी और आयुर्वेद के अनुसार वात, पित्त या कफ का संतुलन बिगड़ना ही रोगों की उत्पत्ति का कारण माना गया है अतः जब वर और कन्या की नाड़ी समान होगी तो दोनों में एक ही तत्व (वात, पित्त,कफ) की अधिकता होगी जिससे विवाहोपरांत दोनों के स्वास्थ में उतार चढाव और रोगोत्पत्ति की अधिक सम्भावनाएं होंगी इसी लिए कुंडली मिलान में समान नाड़ी को दोष माना गया है  इसके आलावा वर कन्या की नाड़ी समान होने पर उनमे विकर्षण की उत्पत्ति होती है ( जिस प्रकार चुम्बक के समान ध्रुवों में विकर्षण होता है) जो की वैवाहिक सम्बन्धों, सन्तानोत्पत्ति आदि के लिए अच्छा नहीं है यह भी समान नाड़ी में दोष का एक कारण है। इसके अतिरिक्त नाड़ी को मनोदशा का सूचक भी माना गया है ज्योतिष में वर्णित ये तीन नाड़ियां हमारे मन की तीन अलग अलग अवस्थाओं को निर्धारित करती है आद्या नाड़ी “आवेग” (जल्दबाजी में रहना) मध्या नाड़ी “उद्वेग” (अवसाद में रहना) और अन्तया नाड़ी “संवेग” (असमंजस की स्थिति में रहना) की सूचक है अब यदि वर वधु दोनों की मानसिक एक जैसी होना भी अच्छा नहीं है क्योंकि दोनों ही व्यक्ति (पति-पत्नि) यदि जल्दबाजी या हड़बड़ाहट में रहने वाले हो, अवसाद में रहने वाले हों या असमंजस में रहने वाले होंगे तो एक दूसरे को किस प्रकार सहायता कर पाएंगे इस दृष्टिकोण से भी कुंडली मिलान में समान नाड़ी वर्जित मानी गयी है अतः कुंडली मिलान और इसमें भी नाड़ी दोष पूर्णतः गहन अध्य्यन और वैज्ञानिक शैली पर ही आधारित है।

नाड़ी दोष का परिहार –

कुंडली मिलान के अंतर्गत कुछ विशेष स्थितियों में नाड़ी दोष का परिहार या काट हो जाती है और नाड़ी दोष उपस्थित होने पर भी नगण्य हो जाता है –

१. यदि वर और कन्या के जन्म नक्षत्र तो समान हों परन्तु राशि अलग अलग हों तो नाड़ी दोष का परिहार हो जाता है।

२. यदि वर और कन्या की राशि समान हों परन्तु नज्म नक्षत्र अलग अलग हों तो नाड़ी दोष का परिहार हो जाता है।

३. यदि वर और कन्या की राशि और नक्षत्र दोनों ही समान हों परन्तु नक्षत्र के चरण अलग अलग हों तो भी नाड़ी दोष का परिहार हो जाता है।

नोट – यदि कुंडली मिलान में नाड़ी दोष हो और ऐसे में वर और कन्या की राशि, नक्षत्र और नक्षत्र का चरण भी समान हो तो नाड़ी दोष परिहार नहीं होता परिहार के लिए राशि और नक्षत्र में से एक की समानता और एक की भिन्नता होनी चाहिए और यदि राशि व नक्षत्र दोनों समान हों तो नक्षत्र के चरण  अवश्य अलग अलग होने चाहिए तभी परिहार माना जाता है तीनो चीज सामान होने पर परिहार नहीं होता। नाड़ी दोष होने पर इसके परिहार की सम्भावना तभी होती है जब वर कन्या की राशि या नक्षत्र निकटतम हों अर्थात आस पास के हों।

विशेष – यदि कुंडली मिलान में नाड़ी दोष हो और उसका परिहार भी ना हो रहा हो तो ऐसे में विवाह ना करने का ही परामर्श दिया जाता है परन्तु किसी विशेष परिस्थिति में यदि नाड़ी दोष होने पर भी विवाह करना ही हो तो इसकी दोष शांति उपाय के लिए वर-वधु द्वारा संकल्प कराकर “महामृत्युंजय” मंत्र के सवालाख मंत्रों का अनुष्ठान योग्य ब्राह्मण से कराकर सामर्थ्यानुसार सप्तधान्य आदि दान करने के बाद विवाह करना चाहिए।

अपने फ़ॉलोअर्स को हम यहाँ एक विशेष बात यह भी बताना चाहेंगे के विवाह हेतु कुंडली मिलान को लेकर हमारे समाज में बहुतसी भ्रांतियां फैली हुई हैं जिनमे सबसे बड़ी बात यही है के केवल गुणों की संख्या के आधार पर ही वैवाहिक जीवन के भविष्य को अच्छा या बुरा समझ लिया जाता है यह बिलकुल भी ठीक नहीं है कुंडली मिलान वास्तव में गुण मिलान और ग्रह मेलापक की एक संयुक्त प्रक्रिया है गुणों की संख्या का इस बात से कोई मतलब नहीं है के हमारा वैवाहिक जीवन कैसा और किस स्तर का होगा गुण मिलान तो यह निश्चित करता है के वर कन्या के स्वाभाव, मानसिकता,आदतें भावनाएं और मन आपस में मिलेंगे या नहीं बाकि वैवाहिक जीवन कैसा है यह हमारी कुंडली में बनी जन्मकालीन ग्रह स्थिति पर निर्भर करता है अतः कुंडली मिलान में न केवल गुण मिलान बल्कि दोनों की कुंडलियों की ग्रह स्थितियों का विश्लेषण करना भी आवश्यक होता है।

।। श्री हनुमते नमः।।

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