जानिए कैसा फल देता है नीच राशि में स्थित ग्रह

जानिए कैसा फल देता है नीच राशि में स्थित ग्रह
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 December 22, 2016

ज्योतिष में अट्ठाइस नक्षत्र, बारह राशियां, नौ ग्रह और बारह भाव जन्मकुंडली निर्माण का आधार होते हैं तथा इन्हीं घटकों के विश्लेषण से किसी भी जातक के जीवन की स्थिति और जीवन में घटने वाली घटनाओं को निश्चित किया जाता है पर ज्योतिष के आधार इन सभी घटकों में भी नव ग्रहों की ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है हमारी जन्मकुंडली में स्थित प्रत्येक ग्रह की अपनी अलग विशेष भूमिका होती है प्रत्येक ग्रह हमारे जीवन के भिन्न भिन्न पक्षों को नियंत्रित करता है। हमारी कुंडली में स्थित प्रत्येक ग्रह वास्तव में दो प्रकार से अपनी भूमिका निभाता है एक तो ग्रह के जो नैसर्गिक गुण तत्व हैं उस रूप में और दूसरा भावेश के रूप में कुंडली में स्थित कोई भी ग्रह जितना बली और अच्छी स्थिति में होगा उतना ही अच्छा परिणाम देगा और उस ग्रह से नियंत्रित होने वाली चीजें जीवन में अच्छी मात्रा में प्राप्त होंगी और जब कोई ग्रह पीड़ित या कमजोर स्थिति में हो तो उस ग्रह से नियंत्रित होने वाली चीजों में संघर्ष उत्पन्न होता है और उस ग्रह से नियंत्रित होने वाले पदार्थों की जीवन में कमी रहती है। नीच राशि किसी भी ग्रह की वह स्थिति होती है जिसमे ग्रह सबसे कमजोर स्थिति में होता है इसलिए नीच राशि में बैठे ग्रह को नकारात्मक परिणाम देने वाला माना गया है।

नकारात्मक दृष्टिकोणयदि कुंडली में कोई ग्रह नीचस्थ हो अर्थात अपनी नीच राशि में स्थित हो तो ऐसे में वह बहुत कमजोर स्थिति में होता है जिससे उस नीचस्थ ग्रह से नियंत्रित होने वाली वस्तुएं या पदार्थ जीवन में बहुत संघर्ष के बाद और कम मात्रा में प्राप्त होती हैं, कुंडली में कोई भी ग्रह नीच राशि में होने पर उसके नैसर्गिक कारक तत्वों में तो संघर्ष उत्पन्न होता ही है साथ ही नीचस्थ ग्रह जिस भाव का स्वामी है उस भाव से नियंत्रित होने वाली चीजों में भी संघर्ष उत्पन्न होता है उदाहरण के लिए यदि मेष लग्न की कुंडली में सूर्य अपनी नीच राशि तुला में हो तो सूर्य नीच राशि में होने से ऐसे में व्यक्ति को प्रसिद्धि प्रतिष्ठा यश और पिता के सुख में तो कमी होगी ही क्योंकि ये सब सूर्य के नैसर्गिक कारक तत्व हैं साथ ही सूर्य यहाँ पँचम भाव का स्वामी है अतः नीचस्थ सूर्य के कारण शिक्षा और संतान से जुडी समस्याएं भी जीवन में रहेंगी। इन सब के अलावा यहाँ एक बात और महत्वपूर्ण है नीच राशि में बैठा ग्रह स्वयं तो कमजोर होता ही है पर जिस भाव में होता है उस भाव को भी बहुत पीड़ित कर देता है और उस भाव से सम्बंधित पदार्थों में संघर्ष उत्पन्न करता है ऊपर वाले उदाहरण के अनुसार मेष लग्न की कुंडली में सूर्य सप्तम भाव में तुला राशि में नीचस्थ होगा तो इससे कुंडली का सप्तम भाव भी पीड़ित हो जायेगा जिससे व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में उतार चढ़ाव और संघर्ष उपस्थित होगा।  

सकारात्मक दृष्टिकोणकुण्डली में किसी भी ग्रह का नीच राशि में होना निश्चित ही एक संघर्ष उत्पन्न करने वाला योग होता है और नीच राशि में स्थित ग्रह से सम्बंधित कारक तत्वों की अल्प मात्रा में प्राप्ति होती है पर नीचस्थ ग्रह के कुछ सकारात्मक पहलू भी होते हैं। जब कुंडली में कोई भी ग्रह अपनी नीच राशि में होता है तो जिस भाव में नीचस्थ ग्रह स्थित होता है उसके सामने वाले भाव अर्थात अपने से सातवे भाव को उच्च दृष्टि से देखता है क्योंकि किसी भी ग्रह की नीच और उच्च राशि परस्पर समसप्तक (आमने सामने) होती हैं जिससे जब कोई ग्रह नीच राशि में होता है तो सामने वाले भाव पर उस नीचस्थ ग्रह की उच्च दृष्टि पड़ती है जिससे वह भाव बहुत बली और मजबूत हो जाता है और भाव के कारक तत्वों में वृद्धि होती है उदाहरण के लिए मकर लग्न की कुंडली में शनि चतुर्थ भाव में अपनी नीच राशि मेष में हो तो वह दशम भाव को उच्च दृष्टि (तुला राशि) से देखेगा जिससे दशम भाव बली होजायेगा और करियर में उन्नतिदायक होगा अतः नीच राशि में बैठा ग्रह अपने सामने वाले भाव को बली कर देता है। इसके आलावा यदि कुंडली में कोई ग्रह नीच राशि में हो और ऐसे में उस नीचस्थ ग्रह की नीच राशि का स्वामी या उच्चनाथ (उस राशि में उच्च होने वाला ग्रह) दोनों में से कोई भी यदि लगन से केंद्र (1,4,7,10 भाव) में हो तो उस ग्रह का नीच भंग होजाता है जिससे नीचस्थ ग्रह के नकारात्मक परिणाम में कुछ हद तक कमी जाती है नीच भंग होने की इस स्थिति को नीचभंग राजयोग भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त यदि लग्न कुंडली में कोई ग्रह नीच राशि में हो पर नवांश कुंडली में वह ग्रह स्व राशि या अपनी उच्च राशि में हो तो भी नीच राशि में होने के नकारात्मक में काफी कमी आजाती है अर्थात नवांश कुंडली में उच्च या स्व राशि में होने से नीचस्थ ग्रह को सकारात्मक बल मिल जाता है और उससे उत्पन्न संघर्ष में कमी आती है।  

  • ग्रह        –   नीच राशि
  • सूर्य          –    तुला
  • चन्द्रमाँ    –    वृश्चिक
  • मंगल        –   कर्क
  • बुध           –   मीन
  • बृहस्पति    –    मकर
  • शुक्र        –   कन्या
  • शनि          –   मेष
  • राहु           –   धनु
  • केतु          –    मिथुन

।।श्री हनुमते नमः ।।

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