वैवाहिक जीवन में तनाव

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 April 11, 2017

विवाह हमारे पारम्परिक सोलह संस्कारों में से एक है, जीवन के एक पड़ाव को पार करके किशोरावस्था से युवास्था में प्रवेश करने के बाद व्यक्ति को जीवन यापन और सामाजिक ढांचे में ढलने के लिए एक अच्छे जीवन साथी की आवश्यकता होती है और जीवन की पूर्णता के लिए यह आवश्यक भी है परन्तु हमारे जीवन में सभी चीजें सही स्थिति और सही समय पर हमें प्राप्त हो ऐसा आवश्यक नहीं है इसमें आपके भाग्य की पूरी भूमिका होती है और जन्मकुंडली इसी भाग्य का प्रतिरूप होती है जहाँ बहुत से  लोगो का वैवाहिक जीवन शांति और सुखमय व्यतीत होता है वहीं बहुत बार देखने को मिलता है के व्यक्ति के वैवाहिक जीवन में हमेशा तनाव और संघर्ष की स्थिति बनी रहती है आपस में वाद विवाद या किसी ना किसी बात को लेकर वैवाहिक जीवन में उतार चढ़ाव की स्थिती बनी ही रहती है ऐसा वास्तव में व्यक्ति की जन्मकुंडली में बने कुछ विशेष ग्रह योगों के कारण ही होता है आईये इसे ज्योतिषीय दृष्टिकोण से जानते हैं।

ज्योतिषीय दृष्टिकोण में हमारी कुंडली कासप्तम भावविवाह का भाव होता है अतः हमारे जीवन में विवाह, वैवाहिक जीवन, पति, पत्नी आदि का सुख सप्तम भाव और सप्तमेश (सातवें भाव का स्वामी) की स्थिति पर निर्भर करता है। इसके आलावा पुरुषों की कुंडली मेंशुक्रविवाह, वैवाहिक जीवन और पत्नी का नैसर्गिक कारक होता है तथा स्त्री की कुंडली में विवाह, वैवाहिक जीवन और पति सुख कोमंगलऔरबृहस्पतिनियंत्रित करते हैं अतः जब किसी व्यक्ति की कुंडली में वैवाहिक जीवन को नियंत्रित करने वाले ये घटक कमजोर या पीड़ित स्थिति में हो तो वैवाहिक जीवन में बार बार तनाव, वादविवाद या उतार चढ़ाव की स्थिति बनती है।

वैवाहिक जीवन में संघर्ष के कुछ विशेष ग्रहयोग –

  1. यदि कुंडली के सप्तम भाव में कोई पाप योग (गुरुचांडाल योग, ग्रहण योग अंगारक योग आदि) बना हुआ हो तो वैवाहिक जीवन में तनाव और बाधाएं उपस्थित होती हैं।
  2. यदि सप्तम भाव में कोई पाप ग्रह नीच राशि में बैठा हो तो वैवाहिक जीवन में संघर्ष की स्थिति बनती है।
  3. राहुकेतु का सप्तम भाव में शत्रु राशि में होना भी वैवाहिक जीवन में तनाव का कारण बनता है।
  4. यदि सप्तम भाव के आगे और पीछे दोनों और और पाप ग्रह हो तो यह भी वैवाहिक जीवन में बाधायें उत्पन्न करता है।
  5. सप्तमेश का पाप भाव (6,8,12) में बैठना या नीच राशि में होना भी वैवाहिक जीवन में उतार चढ़ाव  का कारण बनता है।
  6. पुरुष की कुंडली में शुक्र नीच राशि (कन्या) में हो, केतु के साथ हो, सूर्य से अस्त हो, अष्टम भाव में हो या अन्य किसी प्रकार पीड़ित हो तो वैवाहिक जीवन में तनाव और संघर्ष उत्पन्न होता है।
  7. स्त्री की कुंडली में मंगल नीच राशि (कर्क) में हो, राहु  शनि से पीड़ित हो बृहस्पति नीचस्थ हो राहु से पीड़ित हो तो वैवाहिक जीवन में बाधायें और वाद विवाद उत्पन्न होते हैं।  
  8. पाप भाव (6,8,12) के स्वामी यदि सप्तम भाव में हो तो भी वैवाहिक जीवन में विलम्ब और बाधाएं आती हैं।
  9. सप्तम में शत्रु राशि या नीच राशि (तुला) में बैठा सूर्य भी वैवाहिक जीवन में बाधायें और संघर्ष देता है।  

विशेषयदि पीड़ित सप्तमेश, सप्तम भाव, शुक्र और मंगल पर बृहस्पति की शुभ दृष्टि पड़ रही हो तो ऐसे में वैवाहिक जीवन की समस्याएं अधिक बड़ा रूप नहीं लेती और उनका कोई ना कोई समाधान व्यक्ति को मिल जाता है, वैवाहिक जीवन की समस्यायें अधिक नकारात्मक स्थिति में तभी होती हैं जब कुंडली में वैवाहिक जीवन के सभी घटक पीड़ित और कमजोर हो और शुभ प्रभाव से वंछित हों।

वैवाहिक जीवन में यदि तनाव या संघर्ष की स्थिति हो तो इसके पीछे कुंडली में बने कुछ विशेष ग्रहयोग तो होते ही हैं अतः यदि इनके लिए समय से सटीक उपाय निरंतर रूप से किये जाएँ तो निश्चित ही उनका सकारात्मक परिणाम प्राप्त होता है वैसे तो प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली में बने ग्रहयोग भिन्न होने से सबके लिए व्यक्तिगत उपाय भी अलग ही होते हैं पर यहाँ हम कुछ ऐसे सामान्य उपाय बता रहे हैं जो वैवाहिक जीवन की समस्यायों में सभी के लिए उपयोगी हैं

उपाय विवाह होने में रही बाधायों के लिए निम्न उपाय करें –

  1. अपने सप्तमेश ग्रह के मंत्र का जाप करें।
  2. यदि सप्तम भाव में कोई पाप योग हो या पाप ग्रह हो तो उसका दान करें।
  3. पुरुष जातक शुक्र मंत्र शुम शुक्राय नमः का नियमित जाप करें।
  4. स्त्री जातक अंग अंगरकाय नमः का जाप करें।
  5. पुरुष जातक प्रत्येक शुक्रवार को गाय को चावल की खीर खिलाएं।
  6. स्त्री जातक प्रत्येक मंगल और गुरूवार को गाय को गुड खिलाएं।

।। श्री हनुमते नमः ।।

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