ये ग्रहयोग उत्पन्न करते हैं जीवन में दरिद्रता

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 December 19, 2016

मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थों (धर्म,अर्थ,काम,मोक्ष) में भी दूसरे नम्बर पर अर्थ अर्थात धन को ही रखा गया है क्योंकि जीवन की मूल आवश्यकतायें भी धन पर ही निर्भर करती हैं। हम सब अपने प्रारब्ध से बंधे हुए हैं इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अलगअलग स्थितियां और स्तर प्राप्त होते हैं सबका प्रारब्ध भिन्न होने से सभी व्यक्तियों की आर्थिक स्थिति और भौतिक संसाधनों की स्थिति समान तो नहीं हो सकती, कुछ लोग जीवन में बहुत उच्च आर्थिक स्थिति और ऐश्वर्य पूर्ण जीवन को प्राप्त करते हैं कुछ मध्यम स्थिति को और कुछ समान्य स्थिति को परन्तु बहुत बार हमें देखने को मिलता है के कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण व्यक्ति की मूल आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं हो पातीं और जीवन में दरिद्रता की स्थिति ही बनी रहती है और दरिद्रता को पौराणिक ग्रंथों में भी जीवन के सबसे बड़े दुःख के रूप में दर्शाया गया है तो हम यहाँ ज्योतिषीय दृष्टि से दरिद्रता देने वाले ग्रह-योगों की चर्चा करेंगे क्योंकि हमारी जन्मकालीन नवग्रहस्थिति ही पूरे जीवन के स्तर को तय करने में अपनी भूमिका निभाती है –

जन्मकुंडली मेंदूसरा भावसंचित धन या एकत्रित धन का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए इसे धन भाव भी कहते हैं किसी व्यक्ति के जीवन में एकत्रित धन या पूँजी धन भाव और इसके स्वामी ग्रह पर निर्भर करती है इसके आलावा कुंडली काग्यारहवांभाव (लाभस्थान) आय या लाभ को नियंत्रित करता है व्यक्ति को होने वाली निरन्तर आय या धन लाभ ग्यारहवे भाव और इसके स्वामी पर निर्भर करते हैं।शुक्रधन का नैसर्गिक कारक है अतः जब कुंडली में ये सभी घटक बहुत कमजोर या पीड़ित स्थिति में होते हैं तो व्यक्ति को दरिद्रता का सामना करना पड़ता है और जीवन आर्थिक संघर्ष की स्थिति में ही उलझा रहता है।

कुछ विशेष ग्रहयोग

  1. यदि धनेश बारहवे भाव में हो और शुभ प्रभाव से वंछित हो तो यह योग दरिद्रता उत्पन्न करता है।
  2. धनेश का छटे आठवें भाव में होना और षष्ठेश, अष्ठमेश का धन भाव में होना भी दरिद्रता देता है।
  3. जब धन भाव में गुरुचाण्डाल योग, ग्रहण योग, विष योग या अंगारक आदि पाप योग बने हों तो भी व्यक्ति को दरिद्रता का सामना करना पड़ता है।
  4. लाभेश का भी पाप भाव (6, 8, 12) में जाना, नीच राशि में होना या अति पीड़ित होना दरिद्रता उत्पन्न करता है।
  5. यदि शुक्र नीच राशि (कन्या) में हो, केतु से पीड़ित हो या अष्टम भाव में हो, पूर्णास्त हो तो भी दरिद्रता व्यक्ति के जीवन को घेर लेती है।
  6. पाप ग्रहों का धन भाव में नीच राशि में बैठना भी दरिद्रता उत्पन्न करता है।
  7. जब सूर्य और चन्द्रमाँ परम नीच में हों और नीचभंग आदि ना हो तो भी दरिद्रता आती है।
  8. काल सर्प योग जब धन भाव में बने और अन्य ग्रहस्थिति भी कमजोर हो तो भी दरिद्रता का सामना होता है।
  9. जब कुंडली के तीनो शुभ कारक ग्रह (लग्नेश,पंचमेश,नवमेश) बहुत पीड़ित या कमजोर स्थिति में हों तो भी जीवन में दरिद्रता आती है।  

विशेषऊपर हमने जिन कुछ मुख्य ग्रहस्थितियों का वर्णन किया है उनमे व्यक्ति को निश्चित रूप से संघर्ष का सामना तो करना ही पड़ता है परन्तु ध्यान देने योग्य बात यह है के कभी भी कुंडली में बने किसी एक ही योग को देखकर निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जाता यदि कोई पाप योग  या उपरोक्त में से कोई बुरा योग बनता है पर साथ में उस पर शुभ प्रभाव होने से उसकी तीव्रता कम हो रही हो तो व्यक्ति संघर्ष करके अपने जीवन को सही स्थिति में ले आता है परम संघर्ष और दरिद्रता की स्थिति तभी बनती है जब कुंडली में बने अधिकांश योग नकारात्मक हों और सभी शुभकारक ग्रह कमजोर हों।

उपाय यदि आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर हो की जीवन दरिद्रता में जा रहा हो तो निम्न उपाय श्रद्धा से करने पर अवश्य आपके सहायक होंगे

  1. प्रति दिनश्रीसूक्तका पाठ करें।
  2. शुम शुक्राय नमः का सामर्थ्यानुसार एक, दो, तीन माला जितना संभव हो प्रतिदिन जाप करें।
  3. अपने धनेश ग्रह के मंत्र का भी जाप करें।
  4. घर के मंदिर मेंश्री यन्त्रकी स्थापना करें।
  5. गाय को रोज रोटी पर बताशे रखकर खिलाएं।
  6. घर में तुलसी का पौधा अवश्य लगाएं।
  7. घर के ईशान कोण को हमेशा साफ स्वच्छ रखें।

 ।।श्री हनुमते नमः।।

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