तिलक धारण की गूढ़ता

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 October 6, 2016

सनातन संस्कृति या हिन्दुधर्म विश्व की प्राचीनतम संस्कृति है जिसने आदिकाल से ही धार्मिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक और वैज्ञानिक दृष्टि से विश्व का प्रतिनिधित्व और मार्गदर्शन किया है हिन्दू धर्म में प्रचलित परम्परायें और दिनचर्या के नियम धार्मिक महत्त्व तो रखते ही हैं पर वास्तव में इनके पीछे बड़े गूढ़ महत्त्व भी छिपे होते हैं हमारे पूर्वज ऋषि महाऋषियों ने अपने तपोबल, दिव्यदृष्टि अनुसन्धान और गूढ़ ज्ञान से ही सभी धार्मिक कृत्यों को निश्चित किया है जो धार्मिक और वैज्ञानिक दोनों ही दृष्टि से बड़ा विशेष महत्त्व रखते हैं

हिन्दू धर्म में मस्तक या ललाट के मध्यभाग में तिलक लगाने की परम्परा प्राचीनकाल से ही विद्यमान है किसी भी धार्मिक कार्य, अनुष्ठान, मंगलकार्य और त्यौहार या पर्व पर तिलक लगाने की परंपरा तो है ही साथ ही हमारे शास्त्रों में मस्तक पर तिलक लगाने को दैनिक नियम और दिनचर्या का एक विशेष कार्य भी बनाया गया है और हम सभी अपने जीवन में सहजता से इसका पालन भी करते हैं पर मस्तक पर तिलक लगाने के पीछे हिन्दुधर्म में छिपी गूढ़ और वैज्ञानिक दृष्टि का महत्त्व शायद ही हम जानते हों, मस्तक पर तिलक लगाना धार्मिक महत्त्व तो रखता ही है और हमारे सौन्दर्य और आकर्षण को भी बढ़ाता है पर इसके पीछे बहुत गूढ़ महत्त्व भी छिपे हैं। मस्तक पर तिलक को दोनों भृकुटियों के मध्य भाग में लगाया जाता है योग की दृष्टि से हमारे शरीर में उपस्थित सात चक्रों (मूलाधार,स्वाधिस्ठान,मणिपूर,हृदय,विशुद्धि,आज्ञा, सहस्त्रार) में से आज्ञा चक्र को सबसे अधिक महत्वपूर्ण मन गया है क्योकि आज्ञा चक्र के द्वारा हमारे मन मष्तिष्क और शरीर की सभी गतिविधियां नियंत्रित होती हैं इसलिए ध्यान (मेडिटेशन) करते समय मन को दोनों भृकुटियों के मध्य स्थित आज्ञा चक्र पर ही केंद्रित किया जाता है तो मस्तक पर तिलक लगाने से व्यक्ति का आज्ञा चक्र जागृत और ऊर्जान्वित स्थिति में रहता है जिससे व्यक्ति को अपने मन और मष्तिष्क पर पूरा नियंत्रण प्राप्त होता है और और व्यक्ति का मन एकाग्रचित रहता है जिससे व्यक्ति किसी भी कार्य पर पूर्ण ध्यान केंद्रित करपाता है, इसके अलावा हमारे मन, मष्तिष्क और शरीर को नियकत्रित करने वाली तीन नाड़ियों (इड़ा,पिंगला, सुषुम्ना) में से सुषुम्ना नाड़ी को सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है जो मस्तक पर दोनों भृकुटियों के बीच स्थित होती है मस्तक पर नियमित तिलक लगाने से व्यक्ति की सुषुम्ना नाड़ी जाग्रत स्थिति में आने लगती है जिससे व्यक्ति व्यक्ति का केवल अपने मन मष्तिष्क पर पूरा नियंत्रण होता है बल्कि वह जीवन के गूढ़ रहश्यों को समझने में भी सक्षम हो जाता है और व्यक्ति की इंट्यूशन पावर भी बहुत बढ़ जाती है।

इसके अतिरिक्त मस्तक पर लगा हुआ तिलक हमें सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करके एक रक्षा कवच का भी कार्य करता है नियमित तिलक लगाने वाले व्यक्ति पर नकारात्मक उर्जाये हावी नहीं होती तथा व्यक्ति की आंतरिक शक्ति बढ़ जाने से उस पर अन्य व्यक्ति भी हावी नहीं हो पाते क्योंकि तिलक मस्तक पर ब्रकुतियों के बीच होने से उसी पर सबकी प्रथम दृष्टि पड़ती है ऐसे में यदि सामने वाले व्यक्ति से कुछ नकारात्मक उर्जाये हमारी और आती भी हैं तो मस्तक पर लगा तिलक उन नकारात्मक ऊर्जाओं को नष्ट कर देता है। तिलक को विजय का प्रतीक भी माना गया है इसीलिए प्राचीन काल में युद्ध पर जाते समय राजा और योद्धा तिलक अवश्य धारण करते थे क्योंकि मस्तक पर लगा तिलक व्यक्ति की इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास को बढ़ा देता है इसलिए ऐसे में विरोधियों पर विजय प्राप्त करने में सहायता मिलती है, तिलक लगाने के पीछे एक यह भी गूढ़ बात है के तिलक को मस्तक पर उपस्थित आज्ञा चक्र पर लगाया जाता है और हमारे इष्ट देव/देवी का ध्यान करने पर हमें आज्ञा चक्र पर ही उनके स्वरुप का दर्शन होता है तो मस्तक या आज्ञाचक्र पर तिलक लगा होने से हमारे मन और मष्तिष्क पर हमारे इष्ट का स्वरुप हमेशा जाग्रत स्थिति में रहता है जिससे हमें सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती रहती है। तो यहाँ हमने देखा की हिन्दू धर्म में तिलक लगाने की परम्परा ना केवल धार्मिक महत्त्व रखती है बल्कि इसके पीछे अनेको लाभ और गूढ़ ज्ञान छिपा हुआ है।

जिन लोगों को आत्मविश्वास और इच्छाशक्ति की कमी रहती हो, एकाग्रता होने की समस्या हो, भय रहता हो, नकारात्मक ऊर्जाएं जल्दी हावी होजाती हों, तो ऐसे व्यक्तियों को तिलक अवश्य लगाना  चाहिए और अपनी दिनचर्या में इसे जोड़ना चाहिए। जिन लोगों में आत्मविश्वास की कमी हो उनके लिए रोली और लाल चन्दन का तिलक बहुत अच्छा होता है यदि क्रोध बहुत आता हो या मानसिक तनाव अधिक रहता हो तो सफ़ेद चन्दन का तिलक बहुत  अच्छा होता है सफ़ेद चन्दन का तिलक मन की एकाग्रता को भी बढ़ाता है केसर और हल्दी का तिलक परिपक्व स्वभाव और सात्विक ऊर्जा देता है तो रोलो और लाल चन्दन का तिलक भय से मुक्ति प्रदान करता है गाय के गोबर के उपलों की राख का तिलक भी नकारात्मक ऊर्जाओं से बचाता है।

।। श्री हनुमते नमः।।

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